देश की लोकप्रिय योजना में शुमार हो सकती है अग्निपथ

  • नयी शिक्षा नीति से जोड़कर अग्निवीरों को मिले इंटर और स्नातक प्रमाण-पत्र

अग्निपथ योजना के विरोध में देश के अनेक हिस्सों में जो कुछ भी हुआ, निश्चित तौर पर देश का कोई भी शांति प्रिय नागरिक निंदा करेगा। हम तोड़फोड़, आगजनी, मारपीट का समर्थन तो नहीं कर सकते। पर, इस अग्निपथ योजना का प्रारंभिक ड्राफ्ट बनाने वाले, उसे आगे बढ़ाने वाले बड़े अफसरों और फिर अंतिम मंजूरी देने वाले जिम्मेदार तनिक मिलिट्री के आसपास देख-सोच लेते तो शायद यह देश की बेहद खूबसूरत योजना होती और युवा इसमें न केवल दिलचस्पी लेते बल्कि हर अमीर-गरीब परिवार चाहता कि उसके बच्चों का दाखिला इस स्कीम में हो। क्योंकि आज भी सेना की वर्दी के प्रति देश के लोगों के मन में जो सम्मान है, वह हमें एक अलग स्तर पर लेकर जाता है।

हम सब जानते हैं कि भारतीय सेना का शानदार और गौरवशाली इतिहास है। परम्पराएं हैं। देश भर में मौजूद सैनिक स्कूल्स की अपनी विशिष्ट पहचान है। यहाँ प्रवेश दिलाने को लोग इसलिए आतुर रहते हैं क्योंकि यहाँ से इंटर करने वाले ज्यादातर युवा सेना के तीनों ही विंग में कहीं न कहीं अफ़सर बन जाते हैं। देहरादून स्थित देश के एक मात्र राष्ट्रीय इण्डियन मिलिट्री कॉलेज में प्रवेश पाने का मतलब होता है सेना में अफसर बनने की गारंटी। पूरे देश के छोटे-छोटे बच्चे यहाँ राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर प्रवेश पाते हैं। इसके प्रिंसिपल प्रायः कर्नल रैंक के अफसर होते हैं। एनसीसी की भी देश में अलग पहचान है। एनसीसी के सर्टिफिकेट पर हर जगह आरक्षण की व्यवस्था है। टेरीटोरियल आर्मी का भी गौरवशाली इतिहास है।

17 से 21 वर्ष की उम्र के युवाओं के लिए लागू अग्निपथ स्कीम भी उसी लोकप्रियता को पा सकती थी या यूँ कहें कि पा सकती है, जैसे सेना के तीनों अंगों के बाकी शैक्षिक प्रोग्राम हैं। बस हमें इसे शिक्षा से जोड़ देना था। हमारे देश में नयी शिक्षा नीति लागू हो चुकी है। चार वर्ष के अनेक यूजी कोर्स हमारे यहाँ उपलब्ध हैं। नयी शिक्षा नीति कहती है कि इंडस्ट्री और एकेडमिया एक साथ आयें। एक प्लेटफार्म पर खड़े हों। अगर 21 की उम्र का युवा इस स्कीम को अपनाता है तो वह 25 की उम्र में सेना से फ्री हो जाएगा।

इस समय यूजी कोर्स में दाखिला लेने वाले ज्यादातर युवाओं की उम्र 20-21 ही होती है। अग्निवीरों के सेना छोड़ने के बाद अभी उनका भविष्य सँवारने की अनेक स्कीम केंद्र सरकार ने घोषित कर रखी है। कहीं नौकरियों में आरक्षण तो कहीं अन्य योजनाएँ। कुछ लोग चार वर्ष बाद मिलने वाली राशि से धंधा शुरू करने की वकालत भी करते हुए देखे-सुने जा रहे हैं। भारत सरकार इस चार वर्ष की आंशिक सेवा को शिक्षा से जोड़कर आगे बढ़ा सकती है। बिगड़ा अभी भी कुछ नहीं है। हो सकता है। हाईस्कूल पास होने के बाद अग्निपथ योजना में शामिल होने वालों को दो वर्ष बाद इंटर का प्रमाणपत्र आसानी से दिया जा सकता है। इंटर के बाद चार साल तक इस योजना से जुड़ने वालों को उनकी रूचि के मुताबिक स्नातक डिग्री दी जा सकती है। नयी शिक्षा नीति में इंटर पास युवाओं को दो वर्ष स्नातक कोर्स करने पर डिप्लोमा देने की व्यवस्था है।

हालाँकि, सेना ने भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी है। विज्ञापन निकल गए हैं। जिसे आवेदन करना होगा, करेगा ही। मुझे लगता है कि अग्निपथ योजना के खिलाफ प्रदर्शन और इसका समर्थन दो अलग-अलग कहानियाँ हैं। विरोध राजनीतिक ज्यादा था। पूर्वी उत्तर प्रदेश-बिहार में सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण भी इस विरोध का बड़ा कारण रहा होगा। क्योंकि देश के बाकी हिस्सों में आमतौर पर शांति रही।

अगर चार वर्ष की इस सेवा के बाद युवाओं को स्नातक की डिग्री दे दी जाए, तब जरा सोचिये कि क्या स्थिति बनेगी। शायद आम के आम और गुठलियों के दाम वाली बात यहाँ हो सकती है। हम इसे सेवा न कहकर पढ़ाई-प्रशिक्षण नाम देकर लोकप्रिय बना सकते हैं। अगर ऐसा हो तो चार वर्ष तक सेना में रहकर देश के काम तो युवा आएगा ही, वहाँ से निकलने के बाद उसके लिए पूरा आकाश खुला मिलेगा। स्वागत करेगा।

(लेखक 30 वर्षों से प्रिंट, टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं। ‘हिन्दुस्तान’ अखबार में कई केन्द्रों पर संपादक रहे हैं। )

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