यूं तो बेड़ा गर्क न करो यारों…

लाहौल बिला कूबत…ये मीडिया को क्या हो गया है? पहले तो ये ऐसी न थी। सब खुद ही अपना बेड़ा गर्क किये जा रहे हैं…पत्रकारों के बड़का फैन मियाँ हुजूर कुछ यूँ ही बुदबुदाये जा रहे थे।

चच्ची चाय लेकर आयीं तो भी मियाँ रुके नहीं…चच्ची ने हौंका। सारे देश का ठेका लिये घूमना बंद करो, मियाँ। अपनी सेहत का ख्याल रखो। कब तक हम तुम्हारी देखरेख करते रहेंगे। उम्र हमारी भी कम नहीं हो रही और तुम्हारी भी। लाख समझाओ, मानोगे नहीं तो अबकी मैं चली जाऊँगी सलमान के पास। फिर रहना अकेले और करना देश की चिंता। पत्रकारिता और पत्रकारों की चिंता। ध्यान रखना, चिंता, चिता समान होती है।

“वाह क्या गरमागरम चाय है… बिल्कुल तुम्हारी तरह…”

अमाँ बेगम साहिबा, तुम भी न… मौका देखते ही छक्का मारती हो। बैठो। चाय पियो। वाह क्या गरमागरम चाय है… बिल्कुल तुम्हारी तरह। चच्ची का चेहरा सुर्ख लाल हो गया। बोलीं-फटाफट चाय पियो और नौटंकी बंद करो। चाय सुड़कते हुये मियाँ हुजूर बोले-पंजाब में कांग्रेस ने अमरिंदर को मुख्यमंत्री के पद से हटाया। तुरंत नये सीएम के नाम हवा में उड़ने लगे। टीवी वालों ने तो संभावित सीएम के घर से लेकर मंदिर-गुरुद्वारे तक से लाइव चलाना शुरू कर दिया। उनकी खबरों में बिलकुल सच्चाई नहीं थी। सीएम की कुर्सी चरनजीत सिंह चन्नी को मिली, जिसके बारे में किसी रिपोर्टर को हवा तक नहीं थी।

अनेक किस्से, कई हादसे”

गुजरात के सीएम रुपानी का इस्तीफ़ा हुआ। सबको बाद में ही पता चला, मीडिया को भी। कर्नाटक वाले यदुरप्पा साहब के इस्तीफे में भी कुछ ऐसा ही हुआ। थोड़ा और पीछे जाएँ तो उत्तराखंड में सीएम तीरथ सिंह रावत के इस्तीफे के बाद अनेक विधायकों को हमारी बिरादरी ने सीएम बना दिया। अंत में कुर्सी लगी धामी के हाथ, जो चर्चा में थे ही नहीं। ऐसे अनेक किस्से-हादसे हैं, जहाँ मीडिया की साख पर बट्टा लगा है।

खबरों पर भी खबरें बनने लगी हैं…”

हमारे जमाने में ऐसा नहीं था। सूत्र जबर होते थे। खबर लिख दी तो अगले दिन वही सच होता था। अब तो ब्रेकिंग के चक्कर में सब गड़बड़ होती जा रही है। कोढ़ में खाज ये सोशल मीडिया है। यहाँ की खबरों पर भी खबरें बनने लगी हैं। पत्रकारों ने अपना भरोसा खो दिया है। अब किसी के सूत्र काम नहीं कर रहे हैं या पार्टियाँ पत्रकारों पर भरोसा नहीं करतीं।

“पेशा का बेड़ा गर्क हो रहा है। चहुँओर हमारी निंदा हो रही है”

राजनीतिक फ्रंट पर नाकामयाबी की लम्बी फेहरिस्त है, पत्रकारों के नाम। ये हमारी चिंता की बात है। सोचो, इसी पत्रकारिता ने जेसिका लाल मर्डर से लेकर अनेक किस्से फतह किये। मीडिया के बूते देश में अनेक खुलासे हुये। बड़ी-बड़ी इबारतें मीडिया ने लिखीं। अब जब उसमें गिरावट देखता हूँ तो चिंता स्वाभाविक है, बेगम। अब बताओ। मैं क्या करूँ? 40 साल रोटी खाई है, पत्रकारिता की। आज जो कुछ भी है, उसी का दिया हुआ है। मन दुखी हो जाता है। क्या करूं, तुम्हीं बताओ? मैं भला कहाँ गलत हूँ? पेशा का बेड़ा गर्क हो रहा है। चहुँओर हमारी निंदा हो रही है। अब तो पत्रकार बताओ तो लोग पूछ लेते हैं कि किस पार्टी के? जानती हो, घड़ा भर ठंडा पानी बरबस अपने ऊपर पड़ा हुआ महसूस होता है।

मैं अल्लाह से दुआ करता हूँ कि वे हमारे इस पेशे की पवित्रता, भरोसा लौटा दें। पत्रकारों को सब्र दे दें, जिससे वे ब्रेकिंग के चक्कर में झूठ न चलायें। वे नेताओं की नहीं, जनता की परवाह करें। मेरी तो यही दुआ है। यही दरख्वास्त है। और कुछ नहीं चाहिए मुझे इस उम्र में।

(लेखक 30 वर्षों से प्रिंट और डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं। ‘हिन्दुस्तान’ अखबार में कई केन्द्रों पर संपादक रहे हैं। )

5 thoughts on “यूं तो बेड़ा गर्क न करो यारों…

  1. पत्रकारों पर चैनलों के मालिक अब ज्यादा हावी हैं..क्योंकी मालिक व्यापारी हैं….और व्यापारी को अपने व्यापार पर कोई आंच नहीं चाहिए…वर्ना पत्रकार तो वही हैं..जो तब थे…जो 2 घण्टे में कारर्वाई करवा देते थे…अब सबकी कलम व्यापार और डर के बीच सूख सी गई है….किसी को व्यापार का डर तो किसी को सरकार का डर…

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