UPTET : पूरी व्यवस्था पर भारी नकल माफिया

यूपीटीईटी परीक्षा (UPTET EXAM) कुछ नकलचियों की वजह से रद हो गयी। अब ये 23 लाख युवा फिर इंतजार करेंगे। पर, सवाल यह है कि इस डिजिटल युग में भी हम एक पेपर क्यों नहीं सुरक्षित रख पाते? केंद्रीय संघ लोक सेवा आयोग से क्यों नहीं सीख पाते? इसी राज्य का डॉ एपीजे अब्दुल कलाम तकनीकी विश्वविद्यालय पेपर छपवाता ही नहीं है। इसकी सॉफ्ट कॉपी सीधे सेंटर को जाती है। केंद्र अधीक्षक और विश्वविद्यालय की ओर से नामित प्रतिनिधि एग्जाम के ठीक पहले अपने-अपने कोड डालते हैं। फिर पेपर डी-कोड होकर प्रिंट होता है और स्टूडेंट्स के बीच पहुँचता है।

निश्चित ही हमारे इस सिस्टम में कुछ घुन हैं, जो पूरी राज्य व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने के महत्वपूर्ण कारक हैं। हो सकता है कि शिक्षा मंत्री जी अपने वायदे के मुताबिक एक महीने में दोबारा परीक्षा करा भी दें लेकिन 23 लाख युवाओं के सपने का क्या? और क्या गारंटी है कि अब पेपर नहीं आउट होगा। यह पहला मौका नहीं है, जब एग्जाम में पेपर आउट हुआ है। हमारे यहाँ यह आम बात हो चली है। यूपी की परीक्षाओं में नकल की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसे तकनीक से ही तोड़ा जा सकता है। मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले की चर्चा वर्षों से हो रही है और आने वाले वर्षों में भी वह नकारात्मक नजीर बनती रहेगी।

UPTET EXAM का पेपर 28 नवंबर को सुबह आउट हो गया. इसके कारण परीक्षा रद्द कर दी गई.

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बोर्ड परीक्षाओं में नकल के लिए कई-कई जिले काफी कुख्यात  रहे हैं। बस एक ही मौका आया था जब नकल पर विराम लगने की आस जगी थी, जब श्री राजनाथ सिंह यूपी में शिक्षा मंत्री थे। नकल विरोधी कानून के सहारे, तत्काल जेल भेजे जाने के भय से नकलची और उनके आका सब बिलों में चले गए थे। बहुत बड़ी संख्या में नकल के सहारे एग्जाम पास करने वालों ने परीक्षा ही छोड़ दी थी। बाद में युवाओं के भविष्य के बहाने उस कानून को ही काली कोठरी दिखा दी गयी। अगर स्कूल एग्जाम में, बोर्ड्स एग्जाम में, यूनिवर्सिटी एग्जाम में सख्ती हो, नकल को मौका न दिया जाए, तो ज्यादा उम्मीद है कि पेपर आउट करने वालों को मुँह की खानी पड़े। पर, सोचने का विषय है कि आखिर हम ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

UPTET EXAM रद्द होने के कारण युवाओं को निराशा हुई.

असल में इच्छा शक्ति की कमी हमें रोकती है। जब राज्य लोक सेवा आयोग के एग्जाम के परिणाम आते हैं और एक ही जाति के युवा अफ़सर बनकर निकलते हैं तब सवाल तो उठेगा। और यह किसी से छिपा नहीं है कि राज्यों में नेताजी, मंत्री जी लोग किस तरह अफसरों को दबाव में लेकर अनेक गलत काम करवा लेते हैं और अफ़सर लालच में ऐसा सहज कर भी देते हैं। नेताओं-अफसरों के गठजोड़ से जब भी प्रतिभाएँ कुम्हला जाती हैं तो व्यवस्था से लोगों का भरोसा उठ जाता है। और ख़ुदकुशी जैसी वारदातें आम होती हैं। बीते वर्ष 14825 स्टूडेंट्स ने अपने देश में ख़ुदकुशी की है। मैं यह बिल्कुल नहीं कह रहा हूँ कि इनमें सबके सबने परीक्षाओं में फेल होने या परीक्षाओं के पेपर आउट होने की वजह से मौत को गले लगा लिया हैं लेकिन बार-बार पेपर आउट होगा, एग्जाम टलेंगे, फिर दूसरी तारीख आएगी, कापियाँ जंचेंगी, परिणाम भी देर से आएगा। ध्यान रखना होगा, समय तो नहीं रुकने वाला। 35-40 वर्ष तक के युवा इन नौकरियों के चक्कर में उम्मीद लगाए हुए बैठे देखे जा सकते हैं। 30 वर्ष तक तो पूरे उत्साह से इन्हीं दुश्वारियों के बीच डटे हुए हैं।

UPTET EXAM का पेपर आउट करने के आरोप में मेरठ एसटीएफ ने तीन लोगों को पकड़ा है.

समय आ गया है कि हम इस तरह के एग्जाम कराने वाली संस्थाओं को राजनीतिक जंजाल से मुक्त करें। तकनीक का इस्तेमाल भरपूर हो। युवा अफसरों को इसकी कमान दें। हर हाल में समयबद्ध परीक्षाएँ और परिणाम घोषित हों। वेकेंसी एक हो या अनेक, कोई भी परीक्षा वर्ष में एक बार हो और उसके परिणाम भी वर्ष के अंदर ही आयें। संघ लोक सेवा आयोग इसकी नजीर है। उससे कोई भी एजेंसी सीख सकती है। राज्य सरकारें केंद्रीय व्यवस्था की तर्ज पर एक ही एजेंसी को यह सारा काम दे दें। यूपी ने इस साल सभी प्रोफेशनल कोर्स में प्रवेश परीक्षाओं की जिम्मेदारी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी को दी है तो बाकी एग्जाम के लिए भी इस तरह के मॉडल पर काम किया जा सकता है।

जरा सोचिये कि कितना श्रम, पैसा बर्बाद हो जाता है। UPTET में 2554 प्राथमिक के लिए और 1754 केंद्र उच्च प्राथमिक के लिए बने थे। क्रमशः 13.52 और 8.93 लाख स्टूडेंट्स इस एग्जाम को देने के लिए अपने घरों से निकले। पूरा सरकारी अमला जुटा और हमारे अपने बीच में उपस्थित भेदिये इतनी बड़ी व्यवस्था को पलीता लगाने में कामयाब हुए। यह हमारे लिए शर्मनाक है और यह बताने को पर्याप्त है कि व्यवस्था में झोल है। इस तरह के किसी भी एग्जाम में गड़बड़ी करने वालों पर केवल गैंगेस्टर, रासुका नहीं, इससे भी कठिन और सख्त कानून बनाए जाने की जरूरत है, जो नजीर बन सकें।

(लेखक 30 वर्षों से प्रिंट और डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं। ‘हिन्दुस्तान’ अखबार में कई केन्द्रों पर संपादक रहे हैं। )

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